भारत की लोकतांत्रिक आत्मा को सबसे गहरी चोट तब लगती है जब जनता का विश्वास उस व्यवस्था से डगमगाने लगता है, जिसे उन्होंने चुना है। और यह विश्वास सबसे अधिक तब टूटता है जब भ्रष्टाचार एक अदृश्य दीमक की तरह ,सार्वजनिक संस्थानों की नींव को खोखला करता है।
समस्या की जड़: केवल व्यक्ति नहीं, पूरी प्रणाली
भ्रष्टाचार को केवल रिश्वतखोरी या घूसखोरी तक सीमित करना इसकी गंभीरता को कम आंकना होगा। यह एक संस्थागत बीमारी है, जो निर्णय प्रक्रिया, संसाधनों के आवंटन, और जवाबदेही की कमी में गहराई से समाई हुई है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के 2023 के भ्रष्टाचार बोध सूचकांक में भारत को 180 देशों में से 85वां स्थान मिला, जो बताता है कि सुधार की राह अभी लंबी है।
भ्रष्टाचार दो स्तरों पर होता है:
- बड़ा भ्रष्टाचार: उच्च पदस्थ अधिकारियों और राजनेताओं द्वारा नीतिगत निर्णयों में निजी लाभ के लिए किया गया हस्तक्षेप।
- छोटा भ्रष्टाचार: आम नागरिकों को रोजमर्रा की सेवाओं के लिए निचले स्तर के कर्मचारियों को रिश्वत देनी पड़ती है।
क्यों पनपता है भ्रष्टाचार?
1. जवाबदेही की कमी : जब अधिकारियों को उनके कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जाता।
2. पारदर्शिता का अभाव : निर्णय प्रक्रिया और फंड आवंटन में गोपनीयता।
3. राजनीतिक संरक्षण : भ्रष्ट अधिकारियों को राजनीतिक छत्रछाया मिलना।
4. कानूनी प्रक्रिया की धीमी गति: भ्रष्टाचार के मामलों में वर्षों तक न्याय न मिलना।
5. नैतिक शिक्षा की कमी — सेवा को कर्तव्य नहीं, अवसर मानने की प्रवृत्ति।
समाधान: बहुस्तरीय रणनीति की आवश्यकता
1. प्रणालीगत पारदर्शिता
- सभी सरकारी टेंडर, नियुक्तियाँ और फंड आवंटन की प्रक्रिया को डिजिटल और सार्वजनिक किया जाए।
- RTI (सूचना का अधिकार) को और सशक्त बनाया जाए, ताकि नागरिकों को जानकारी तक सहज पहुँच मिले।
2. जवाबदेही और निगरानी तंत्र
- लोकपाल और लोकायुक्त संस्थाओं को स्वतंत्र और शक्तिशाली बनाया जाए।
- सीवीसी (Central Vigilance Commission) और सीबीआई को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त किया जाए।
3. डिजिटलीकरण और तकनीकी समाधान
- ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देकर मानवीय हस्तक्षेप को कम किया जाए।
- ब्लॉकचेन तकनीक का उपयोग कर फंड ट्रैकिंग और रिकॉर्ड-कीपिंग को पारदर्शी बनाया जा सकता है।
4. नैतिक शिक्षा और प्रशिक्षण
- स्कूलों और सरकारी प्रशिक्षण संस्थानों में नैतिकता और सेवा मूल्यों पर आधारित पाठ्यक्रम अनिवार्य किए जाएं।
- Whistleblower Protection Act को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, ताकि भ्रष्टाचार उजागर करने वालों को सुरक्षा मिले।
5. सामाजिक चेतना और जनभागीदारी
- नागरिकों को यह समझाना ज़रूरी है कि रिश्वत देना भी उतना ही अपराध है जितना लेना।
- जन आंदोलनों और मीडिया को सशक्त बनाकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनदबाव बनाया जाए।
निष्कर्ष: व्यवस्था को बदलने के लिए दृष्टिकोण बदलना होगा
भ्रष्टाचार केवल कानूनों से नहीं मिटेगा, जब तक कि व्यवस्था में नैतिकता का पुनर्जागरण न हो। यह एक सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक त्रिकोण है, जिसे एक साथ साधना होगा। भारत की युवा शक्ति, तकनीकी नवाचार और जन-जागरूकता मिलकर इस लड़ाई को निर्णायक बना सकते हैं।
क्योंकि जब व्यवस्था खुद को दर्पण में देखती है, तभी सुधार की शुरुआत होती है।